बिहार शराबबंदी: कोडवर्ड ‘प्योर मिल्क’ से चल रहा 30,000 करोड़ का काला बाजार

पटना
राजधानी के पॉश इलाके कंकड़बाग में 'प्योर मिल्क' (शुद्ध दूध) का मतलब पाश्चुरीकृत दूध का कोई पैकेट नहीं है। ये महंगी ब्लेंडेड स्कॉच व्हिस्की का एक कोड वर्ड है, जो जासूसी नजरों से बचने के लिए टेट्रा पैक में आती है। सूखे बिहार (शराबबंदी) में जहां पिछले 10 वर्षों से शराबबंदी ने 'सोनपापड़ी' को महंगी शराब (जो झारखंड, यूपी और बंगाल से तस्करी कर लाई जाती है) के कोड में बदल दिया है। यहां, ये अवैध कारोबार न केवल जीवित है, बल्कि चूहे-बिल्ली के खेल की तरह फल-फूल रहा है। कई जिलों, कस्बों और राजधानी पटना में 'समोसेवाला', 'ग्रॉसरीवाला' और 'संन्यासी बाबा' उन युवाओं के लिए कोड वर्ड हैं, जो समय पर विदेशी शराब (IMFL) की होम डिलीवरी सुनिश्चित करते हैं।
'सर, मैं खुशियां पहुंचाता हूं'
बिहार अप्रैल 2016 से 'ड्राई' है, लेकिन यह केवल कागजों पर है। वास्तव में ये एक बेहद प्यासी भूमि है, जहां अधिकांश पिज्जा डिलीवरी से भी तेज एक सटीक होम-डिलीवरी सिस्टम काम कर रहा है। शराबबंदी ने एक फलता-फूलता काला बाजार बना दिया है, जहां युवा एजेंटों द्वारा शराब दरवाजे तक पहुंचाई जाती है। विपक्षी नेताओं के अनुसार, ये एजेंट एक सक्रिय अवैध सप्लाई चेन की साइलेंट समझ के साथ काम करते हैं।
शराब पर पूर्ण प्रतिबंध के एक दशक बाद भी शराब की मांग खत्म नहीं हुई है। ये बस पर्दे के पीछे चली गई है। पटना के कई पॉश इलाकों में होम डिलीवरी के धंधे में शामिल 'ट्यूशन मैम', 'नर्स मैम' और 'पार्लरवाली' उन युवतियों के कोड हैं, जो शराब की डिलीवरी करती हैं।
पटना में होम-डिलीवरी एजेंट मुन्ना से मुलाकात हुई। वो फॉर्मल शर्ट पहनता है। स्कूटर चलाता है और लैपटॉप बैग ले जाता है। उसने टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) संवाददाता से कहा, 'सर, मैं खुशियां पहुंचाता हूं।' साथ ही जोड़ा कि वो 'खुशी' यूपी या झारखंड से तस्करी कर लाई गई प्रीमियम विदेशी शराब होती है। मुन्ना की सबसे बेहतरीन तरकीब ब्रांडेड कंपनियों के खाने के खाली डिब्बों के अंदर छिपी बोतलें पहुंचाना है। वो 'किराना-वाला' बनकर घरों में जाता है।
5 मिनट में 'संन्यासी बाबा' की डिलिवरी
पटना के मोहल्लों में शराबबंदी ने पार्टियों को नहीं रोका। बस, उन्हें गुप्त बना दिया। 'संन्यासी बाबा' से भी मुलाकात हुई, जो एक स्थानीय होम-डिलीवरी नेटवर्क के अनौपचारिक सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) हैं। जहां प्रमुख ऐप्स 10 मिनट में किराना सामान पहुंचाते हैं, वहीं 'संन्यासी' का नेटवर्क पांच मिनट में डिलीवरी करता है, बेशक अतिरिक्त शुल्क के साथ। यहां ब्रांड के आधार पर 180 मिलीलीटर के पैक की कीमत 200 रुपये से बढ़कर 600 रुपये तक हो जाती है।
ये सिस्टम लगभग अचूक है। कोई दुकान या साइनबोर्ड नहीं है। बस 'हेल्थ एंड फिटनेस' नाम का एक व्हाट्सएप ग्रुप है। एक मैसेज 'दो प्रोटीन शेक' और 'दो प्योर मिल्'क चाहिए। कुछ ही मिनटों में एक 'दूधवाला' भारी दूध के केन लेकर मोटरसाइकिल पर आ जाता है।
विवादित सामाजिक प्रयोगों में से एक
बिहार की शराबबंदी नीति भारत के सबसे विवादित सामाजिक प्रयोगों में से एक बनी हुई है, जो मापने योग्य सामाजिक लाभों, भारी राजकोषीय लागतों और प्रवर्तन की लगातार विफलताओं से चिह्नित है। तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार न बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद शुल्क अधिनियम, 2016 के जरिए से शुरू किया गया ये प्रतिबंध शराबखोरी, गरीबी और घरेलू हिंसा को कम करने के लिए महिलाओं की मांगों के जवाब के रूप में पेश किया गया था।
एक दशक बाद, इसका रिकॉर्ड एक तरफ घरेलू कल्याण और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार, तो दूसरी तरफ राजस्व का पतन, काले बाजार का विस्तार और न्यायिक बोझ के बीच बुरी तरह विभाजित है। कानूनी बाजार के गायब होने से मांग खत्म नहीं हुई। इसके बजाय, इसने एक विशाल अवैध व्यापार के लिए जगह बना दी। अनुमान बताते हैं कि बिहार में अब 25,000 करोड़ रुपये से 30,000 करोड़ रुपये की समानांतर शराब अर्थव्यवस्था चल रही है।
इसके अलावा, दशक भर की शराबबंदी ने आम नागरिकों को 'आविष्कारशील' तस्करों में बदल दिया है, जिनकी इंजीनियरिंग की महारत बड़े-बड़े मैकेनिकों को मात दे सकती है।
बिहार में शराब तस्करी का 'निंजा तकनीक'
तस्करों ने हाल ही में वो अपनाया है जिसे पुलिस 'निंजा तकनीक' कहती है। फरवरी में एक व्यक्ति को अपनी मोटरसाइकिल से बंधी खोखली प्लास्टिक की कुर्सियों के अंदर छिपाई गई दर्जनों बोतलों के साथ पकड़ा गया था। ब्लॉकबस्टर फिल्म 'पुष्पा' से प्रेरणा लेते हुए, किशनगंज जिले में ताजे टमाटर और गोभी के नीचे छिपाई गई 862 लीटर विदेशी शराब ले जाते हुए तस्करों को पकड़ा गया। मुजफ्फरपुर जाने वाला एक साधारण सब्जी का ट्रक लग रहा था, लेकिन आखिरकार व्हिस्की की गंध सब्जियों की खुशबू पर भारी पड़ गई और भेद खुल गया।
नवादा में पुलिस ने एक ऐसी मोटरसाइकिल बरामद की जिसका ईंधन टैंक पूरी तरह से शराब के लिए इस्तेमाल किया गया था। बाइक को चालू रखने के लिए तस्करों ने सीट के नीचे एक छोटा सा अलग पेट्रोल बॉक्स लगाया था। शराब के पाउच या बोतलें कटे हुए गैस सिलेंडरों, पानी के टैंकरों और एम्बुलेंस के अंदर भी ठूंस दी जाती हैं। सारण में 'स्वच्छ भारत अभियान' और 'बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ' जैसे सरकारी नारों वाला एक टैंकर हरियाणा निर्मित व्हिस्की के 330 कार्टन से भरा पाया गया।
शराब तस्करी में इस्तेमाल कोडवर्ड का मतलब
बिहार में शराब तस्करी के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रमुख कोड वर्ड्स और उनके असली मतलब जानें।
प्योर मिल्क: पॉश इलाकों में 'महंगी स्कॉच व्हिस्की' के लिए इस्तेमाल होने वाला कोड।
सोनपापड़ी: पड़ोसी राज्यों से तस्करी कर लाई गई 'महंगी शराब' का गुप्त नाम।
प्रोटीन शेक: वाट्सऐप ग्रुप्स पर 'शराब की बोतलों' के ऑर्डर के लिए कोड।
संन्यासी बाबा: स्थानीय शराब नेटवर्क के 'मुख्य संचालक या मास्टरमाइंड' का नाम।
समोसेवाला/ग्रॉसरीवाला: घर पर शराब पहुंचाने वाले 'युवा डिलीवरी एजेंटों' की पहचान।
हेल्थ एंड फिटनेस: शराब के शौकीनों के लिए बना गुप्त 'वाट्सऐप सप्लाई ग्रुप'।
ट्यूशन मैम/नर्स मैम/पार्लरवाली: होम डिलीवरी करने वाली 'महिला एजेंटों' के कोड।
खुशियां: डिलीवरी एजेंटों की ओर से प्रीमियम 'विदेशी शराब' के लिए संबोधन।
निंजा तकनीक: खाली कुर्सियों या सब्जियों के नीचे 'शराब छिपाने' का तरीका।
दूधवाला: मोटरसाइकिल पर दूध के केन में 'शराब की खेप' ढोने वाला।
सूखे नशे की चपेट में नौजवान
इस प्रतिबंध ने एक बड़े कानूनी खुदरा बाजार को भी खत्म कर दिया। शराबबंदी से पहले, बिहार में लगभग 5,480 लाइसेंस प्राप्त शराब की दुकानें थीं, जो अनुमानित 30,000 से 40,000 परिवारों की आजीविका का सहारा थीं। जहां आपराधिक पैमाना चौंकाने वाला रहा है। पिछले 10 वर्षों में 16 लाख पियक्कड़ों को गिरफ्तार किया गया और 4.5 करोड़ लीटर शराब जब्त की गई। वहीं, इसका एक और अनपेक्षित परिणाम सामने आया है, नशीले पदार्थों के सेवन में इजाफे ने युवाओं के बीच तबाही मचा दी है।
गांजा, अफीम, चरस और कफ सिरप उन अभ्यस्त पियक्कड़ों की पहली पसंद बन गए हैं, जिनकी महंगी शराब तक पहुंच नहीं है। एक और गंभीर परिणाम नकली शराब का प्रसार रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में मांग को खत्म करने में विफलता ने निम्न-गुणवत्ता वाली और कभी-कभी जहरीली शराब की बिक्री को प्रोत्साहित किया है, जिससे बार-बार जहरीली शराब की त्रासदियां हो रही हैं।
शराबबंदी पर पुनर्विचार करने की मांग
दशक भर में सिवान, बेगूसराय और पूर्वी चंपारण सहित जिलों में मेथनॉल के जहर से सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। इन मौतों के पैमाने ने अंततः राज्य सरकार को पीड़ितों के परिवारों के लिए 4 लाख रुपये का मुआवजा बहाल करने के लिए मजबूर किया। कम उम्र के उपयोगकर्ताओं के बीच, शराबबंदी ने नशे को खत्म करने के बजाय उपभोग के पैटर्न को बदल दिया है। अध्ययनों में पाया गया है कि 25% से अधिक अभ्यस्त पियक्कड़ गांजा और चरस के अलावा अन्य पदार्थों, यहां तक कि सिंथेटिक ड्रग्स की ओर बढ़ गए हैं। 'सूखे नशे' में ये वृद्धि इस प्रतिबंध के सबसे चिंताजनक दुष्प्रभावों में से एक बन गई है।
जैसे ही बिहार शराबबंदी के अपने दूसरे दशक में प्रवेश कर रहा है, इस नीति के इर्द-गिर्द राजनीतिक एकजुटता में दरारें दिखने लगी हैं। महिला समूह इसके सबसे मजबूत समर्थक बने हुए हैं, लेकिन सभी दलों में इस पर पुनर्विचार की मांग बढ़ रही है।
सर्वे में 58% लोगों ने कहा- शराब तक उनकी पहुंच है
हालांकि, सरकार ने पीछे हटने के कोई संकेत नहीं दिए हैं, नए मुख्यमंत्री (भाजपा के सम्राट चौधरी) का कहना है कि प्रतिबंध जारी रहेगा, बिहार एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता नरम ढांचे का हो सकता है, जो शायद विनियमित परमिटों के गुजरात मॉडल के करीब हो। दूसरा, काले कारोबार इजाफा और संस्थागत तनाव के बढ़ते प्रमाणों के बावजूद कठोर शराबबंदी को जारी रखना है।
शराबबंदी से पहले बिहार को उत्पाद शुल्क से सालाना 3,142 करोड़ रुपये की आमदनी थी। 10 वर्षों में कुल राजस्व हानि 30,000 करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है। बिहार में 5,480 लाइसेंस प्राप्त दुकानें थीं, जो 30,000 से 40,000 परिवारों का भरण-पोषण करती थीं। पटना विश्वविद्यालय के एक सर्वेक्षण में 58% लोगों ने कहा कि उनकी शराब तक पहुंच है, जो अक्सर बाजार की पिछली कीमत से दोगुनी कीमत पर मिलती है। पूर्व सीजेआई एनवी रमना ने बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद शुल्क अधिनियम 2016 को 'दूरदर्शिता की कमी' के साथ तैयार किए गए कानून के उदाहरण के रूप में बताया था।



