पंजाबराज्य

मेडिकल नेग्लिजेंस मामलों में डॉक्टरों को सीधे तलब न करें, पहले लें विशेषज्ञों की राय: हाई कोर्ट

चंडीगढ़.

चिकित्सकीय लापरवाही (मेडिकल नेग्लिजेंस) के मामलों में डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई को लेकर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि स्वतंत्र और सक्षम चिकित्सा विशेषज्ञ की राय के बिना किसी डॉक्टर को आपराधिक मुकदमे में तलब करना कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल मरीज की मृत्यु हो जाने या उपचार असफल रहने भर से डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक लापरवाही का मामला नहीं बनता है। न्यायमूर्ति मनीषा बत्रा की पीठ ने निचली अदालत द्वारा जारी समन आदेश को रद करते कहा कि मजिस्ट्रेट ने चिकित्सा साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और विशेषज्ञ चिकित्सकीय राय का इंतजार किए बिना डाक्टरों को मुकदमे का सामना करने के लिए बुला लिया। अदालत ने इसे गंभीर त्रुटि माना।

तरनतारन से जुड़ा है मामला
मामला तरनतारन में एक महिला की प्रसव के बाद हुई मृत्यु से जुड़ा था। पति का आरोप था कि पत्नी को प्रसव पीड़ा होने पर एक नर्सिंग होम में भर्ती कराया था। शुरू में सामान्य प्रसव का आश्वासन दिया गया, बाद में ऑपरेशन में महिला ने जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया। आरोप था कि इसके बाद महिला की हालत बिगड़ गई, अत्यधिक रक्तस्राव हुआ और उसे दूसरे अस्पताल रेफर करना पड़ा, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। पति ने डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए आपराधिक शिकायत दायर की थी। प्रारंभिक साक्ष्यों के आधार पर न्यायिक मजिस्ट्रेट ने डाक्टरों को भारतीय दंड संहिता की धारा 304-ए (लापरवाही से मृत्यु) सहित अन्य धाराओं के तहत तलब कर लिया था। इसके खिलाफ डॉक्टर हाई कोर्ट पहुंचे। हाई कोर्ट में डाक्टरों की ओर से कहा गया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई चिकित्सकीय साक्ष्य नहीं है जो उनकी लापरवाही साबित करता हो।

डॉक्टरों को दोषमुक्त करारा दिया गया
एक जांच टीम ने भी रिपोर्ट में डॉक्टरों को दोषमुक्त करार दिया था। अदालत ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने केवल इस आधार पर समन जारी कर दिया कि महिला की मृत्यु प्रसव संबंधी जटिलताओं के कारण हुई।
अदालत ने कहा कि किसी डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया शुरू होते ही उसे गिरफ्तारी के भय, जमानत की कार्यवाही और पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान जैसी गंभीर परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। यदि बाद में वह निर्दोष भी साबित हो जाए, तब भी उसकी प्रतिष्ठा को हुई क्षति की भरपाई संभव नहीं होती।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button