मध्य प्रदेशराज्य

भागीरथपुरा दूषित पानी कांड पर कांग्रेस का आंदोलन का ऐलान, जांच रिपोर्ट को बताया ‘लीपापोती’

इंदौर.

इंदौर के भागीरथपुरा में हुए दूषित पानी कांड को लेकर सियासत और संवेदनाओं का दौर तेज हो गया है। प्रशासन की बहुचर्चित जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद रविवार को कांग्रेस पूरी तरह से एक्शन मोड में नजर आई।

सुबह 10 बजे से ही शहर कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता पीड़ित परिवारों का दर्द बांटने उनके बीच पहुंच गए। पार्टी ने स्पष्ट किया है कि वह प्रभावितों की राय और उनके दर्द के आधार पर ही सरकार के खिलाफ एक बड़े और चरणबद्ध आंदोलन की रूपरेखा तैयार करेगी।

मृतक जीवनलाल के परिवार से मिले कांग्रेसी
शुक्रवार रात को शहर कांग्रेस की अहम बैठक में यह तय हुआ था कि पार्टी का हर नेता सीधे पीड़ितों से जाकर मिलेगा। इसी कड़ी में रविवार को शहर कांग्रेस अध्यक्ष चिंटू चौकसे के नेतृत्व में टीम ने घर-घर जाकर दस्तक दी। जनसंपर्क की शुरुआत सबसे पहले इस हादसे में अपनी जान गंवाने वाले जीवनलाल के घर से की गई। इसके बाद नेताओं ने भागीरथपुरा के अन्य प्रभावित परिवारों से भी मुलाकात कर उनकी वर्तमान स्थिति, शिकायतें और प्रशासन की जांच रिपोर्ट को लेकर उनके मन की बात जानी।

30 साल की लापरवाही की जांच रिपोर्ट में खुली परतें
भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से बीमारी और मौतों के मामले में एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट ने व्यवस्था की लंबी चूक को उजागर किया है। बुधवार को हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड हुई रिपोर्ट के मुताबिक, यह संकट किसी एक अधिकारी की गलती से पैदा नहीं हुआ, बल्कि करीब तीन दशक में सीवर और जलापूर्ति व्यवस्था से जुड़ी कई खामियां, निगरानी की कमी, शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई न होना और पाइपलाइन बदलने में हुई लंबी देरी धीरे-धीरे जमा होती गईं। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सीवर और पेयजल लाइनों की तकनीकी स्थिति से लेकर नगर निगम की निगरानी व्यवस्था और पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया तक कई स्तरों पर कमियां दर्ज की हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भागीरथपुरा में दूषित पानी का खतरा दिसंबर 2025 में अचानक पैदा नहीं हुआ था, बल्कि पुरानी पाइपलाइन व्यवस्था में मौजूद तकनीकी जोखिम लंबे समय से बने हुए थे।

कई जगह सीवर लाइन पानी की पाइपलाइन के ऊपर
जांच में सामने आया कि भागीरथपुरा में सीवर नेटवर्क 1990 से 1995 के बीच और जलापूर्ति पाइपलाइन 1999 से 2004 के बीच बिछाई गई थी। कई स्थानों पर दोनों नेटवर्क समानांतर, जबकि कुछ जगह एक-दूसरे को क्रॉस कर रहे थे। आयोग ने पाया कि दोनों लाइनों के बीच निर्धारित दूरी भी कई स्थानों पर नहीं थी। कुछ जगह सीवर लाइन पेयजल पाइपलाइन के ऊपर तक थी। आयोग ने इस स्थिति को दूषित पानी के पेयजल नेटवर्क में प्रवेश के लिए गंभीर तकनीकी जोखिम माना है। यानी जिस नेटवर्क से लोगों के घरों तक पानी पहुंच रहा था, उसमें संक्रमण का खतरा पाइपलाइन बिछाए जाने के समय से ही मौजूद था।

शिकायतें आती रहीं, व्यवस्था कमजोर रही
आयोग के समक्ष अधिकारियों और स्थानीय लोगों के बयानों में पाइपलाइन लीकेज, खराबी और पानी की गुणवत्ता को लेकर लगातार शिकायतों का उल्लेख हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, जलापूर्ति नेटवर्क की पर्याप्त मैपिंग, संवेदनशील स्थानों की पहचान, लीकेज की निगरानी और समय पर मरम्मत की व्यवस्था प्रभावी नहीं थी। आयोग ने इसे महज तकनीकी समस्या न मानते हुए संस्थागत स्तर की विफलता भी माना है।

चार साल में पूरा हुआ पाइप बदलने का काम 
पुरानी पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया वर्ष 2022 में शुरू हुई, लेकिन टेंडर और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में लगातार देरी होती रही। आयोग ने अलग-अलग चरणों में हुई देरी का ब्योरा भी रिपोर्ट में दर्ज किया है।

पहले टेंडर में—
टेंडर जारी करने में – 39 दिन की देरी
एमआइसी स्तर पर निर्णय में – 63 दिन
अनुबंध प्रक्रिया में करीब – 94 दिन
काम पूरा करने की निर्धारित समयसीमा – मई 2024
वास्तविक पूर्णता – जनवरी 2026

आयोग के आकलन के मुताबिक, विभिन्न चरणों की देरी को मिलाकर असामान्य विलंब 859 दिन से अधिक रहा। रिपोर्ट में टेंडर शाखा, इंजीनियरिंग अधिकारियों, प्रशासनिक स्तर, पर्यवेक्षण व्यवस्था और ठेकेदार की भूमिका की अलग-अलग समीक्षा की गई है।

126 दिन बाद तय हुआ कि टेंडर फिर से होगा
दूसरे टेंडर की वित्तीय बोली 22 अगस्त 2024 को खोली गई थी। इसके बाद दोबारा टेंडर कराने की सिफारिश 26 दिसंबर 2024 को की गई। यानी इस निर्णय तक पहुंचने में करीब 126 दिन लग गए। इसके बाद तीसरे टेंडर में भी प्रक्रिया तेज नहीं हुई। तकनीकी और वित्तीय बोली की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मामला टेंडर समिति के समक्ष रखने में करीब 94 दिन लगे। इस तरह तीन टेंडर और सैकड़ों दिनों की प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद पाइपलाइन जनवरी 2026 में बदली जा सकी, जबकि मूल रूप से काम मई 2024 तक पूरा होना था।

पुराने रिकॉर्ड नहीं मिले, जांच में आई मुश्किल
जांच आयोग को पुराने सीवर और जलापूर्ति नेटवर्क से संबंधित मूल नक्शे, वर्क ऑर्डर, माप पुस्तिका, निरीक्षण रिकॉर्ड और पूर्णता प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं कराए जा सके। आयोग ने कहा कि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण यह तय करना मुश्किल रहा कि मूल निर्माण के दौरान किस स्तर पर और किस प्रकार की चूक हुई थी।

कई अधिकारियों और महापौर परिषद को क्लीनचीट
रिपोर्ट में तत्कालीन निगमायुक्त और वर्तमान कलेक्टर शिवम वर्मा, तत्कालीन निगमायुक्त एवं वर्तमान पर्यटन विभाग के एमडी दिलीप यादव तथा तत्कालीन निगमायुक्त और वर्तमान सागर कलेक्टर प्रतिभा पाल को क्लीनचीट दी गई है। इसके अलावा तत्कालीन अपर आयुक्त अभिलाष मिश्रा, अपर आयुक्त सिद्धार्थ जैन और अभिषेक गेहलोत को भी जांच में क्लीनचीट मिली है। आयोग के अनुसार, इन अधिकारियों के कार्यकाल में पानी की पाइपलाइन बिछाने के काम में कोई देरी सामने नहीं आई। महापौर और महापौर परिषद को भी आयोग ने क्लीनचीट दी है।

दो अपर आयुक्त और इंजीनियर पर लापरवाही की टिप्पणी
आयोग ने तत्कालीन अपर आयुक्त भव्या मित्तल और रोहित सिसोनिया को लापरवाही के लिए जिम्मेदार माना है। वहीं, तत्कालीन नर्मदा प्रोजेक्ट प्रभारी कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव की भूमिका पर गंभीर टिप्पणी की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 15 अक्टूबर 2025 को रोहित सिसोनिया ने भागीरथपुरा के टेंडर के संबंध में संजीव श्रीवास्तव को चर्चा करने के लिए लिखा था, लेकिन इस पर 26 दिसंबर को चर्चा हुई। आयोग ने इसे करीब 72 दिन की देरी माना। रिपोर्ट में कहा गया है कि संजीव श्रीवास्तव की ओर से अनावश्यक देरी हुई, जबकि रोहित सिसोनिया ने मामले की पर्याप्त निगरानी नहीं की। भव्या मित्तल के कार्यकाल में भी टेंडर फाइल में देरी का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है।

मृतकों के स्वजन को 10 लाख रुपये मुआवजे की अनुशंसा
न्यायिक जांच आयोग ने दूषित पानी के कारण जान गंवाने वाले लोगों के स्वजन को 10-10 लाख रुपये क्षतिपूर्ति दिए जाने की अनुशंसा की है। फिलहाल मृतकों के स्वजन को रेडक्रास सोसायटी के माध्यम से दो-दो लाख रुपये की राहत राशि दी जा चुकी है।

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