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भगवान शिव कैसे बने अर्द्धनारीश्वर, माता सिद्धिदात्री की कृपा और अष्ट सिद्धियों से जुड़ी है यह अद्भुत कथा

भगवान शिव देवे के देव कहलाते हैं। आज हम आपको महादेव के अर्द्धनारीश्वर रूप से जुड़ी एक कथा बताने जा रहे हैं

 भगवान शिव का 'अर्द्धनारीश्वर' स्वरूप विशेष महत्व रखता है। साथ ही भगवान शिव का यह स्वरूप प्रेरणा भी देते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि भगवान शिव ने किस देवी से सिद्धियां प्राप्त की और वह कैसे अर्द्धनारीश्वर कहलताए।

इसलिए कहलताए 'अर्द्धनारीश्वर'
भगवान शिव को सभी आठ सिद्धियां माता सिद्धिदात्री की आराधना से प्राप्त हुई हैं। सिद्धिदात्री का है अर्थ सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली। माता सिद्धिदात्री, मां दुर्गा का नौवां रूप हैं। मार्कण्डेयपुराण के अनुसार, आठ सिद्धियां अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व हैं।

देवीपुराण में इस बात का वर्णन मिलता है कि भगवान शिव ने माता सिद्धिदात्री की कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था और उनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हो गया था, जिस कारण वह 'अर्द्धनारीश्वर' कहलाए।

देवी सिद्धिदात्री का स्वरूप –
 मां सिद्धिदात्री कमल पर विराजमान रहती हैं। लाल साड़ी में अत्यंत शांत और सौम्य दिखती हैं। इनकी चार भुजाएं हैं, जिसमें उन्होंने सुदर्शन चक्र, शंख, गदा और कमल धारण किया हुआ है। देवी सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है। माना जाता है कि देवी सिद्धिदात्री की आराधना से अष्ट सिद्धि, नव निधि, ज्ञान, और सभी प्रकार की सांसारिक व आध्यात्मिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

    अणिमा – अपने शरीर को अत्यंत सूक्ष्म या परमाणु के बराबर छोटा कर लेने की शक्ति।
    महिमा – अपने शरीर को विशाल या ब्रह्मांड जितना बड़ा कर लेने की क्षमता।
    गरिमा – शरीर का भार अनंत गुना तक बढ़ा लेने की शक्ति, जिसे कोई हिला न सके।
    लघिमा – शरीर को रुई से भी हल्का कर लेने की शक्ति।
    प्राप्ति – किसी भी वस्तु को तुरंत प्राप्त कर लेना या कहीं भी पहुंच जाने की क्षमता।
    प्राकाम्य – किसी भी इच्छा को तुरंत पूरा कर लेने की क्षमता।
    ईशित्व – यह दिव्य शक्तियां होती हैं, जिससे प्रकृति पर नियंत्रण किया जा सकता है।
    वशित्व – सभी जीवों या इंद्रियों को अपने वश में रखने की क्षमता।

क्या दर्शाता है अर्द्धनारीश्वर स्वरूप
भगवान शिव के अर्द्धनारीश्वर में उनका आधा भाग पुरुष रुपी शिव का वास है, तो वहीं, आधे हिस्से में स्त्री रुपी शिवा यानि शक्ति का वास है। यह स्वरूप दर्शाता है कि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं।

साथ ही अर्द्धनारीश्वर रूप भगवान शिव पुरुष (चेतना) और पार्वती स्त्री (ऊर्जा/शक्ति) का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में भगवान शिव के इस स्वरूप से यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि स्त्री और पुरुष दोनों ही एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं और दोनों का सम्मान जरूरी है।

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