मध्य प्रदेशराज्य

MP में आयुष्मान योजना पर निजी अस्पतालों की हड़ताल टली, करोड़ों के बकाये पर पेंच बरकरार

जबलपुर.

आयुष्मान भारत निरामयम योजना के तहत मरीजों के कैशलेस इलाज पर मंडरा रहा संकट फिलहाल टल गया है, लेकिन राहत अधूरी है। जबलपुर सहित मध्य प्रदेश के निजी अस्पताल आठ अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने वाले थे।

भोपाल में सात और आठ अक्टूबर को आयुष्मान विभाग के सीईओ तथा दीनदयाल स्वास्थ्य सुरक्षा परिषद के साथ लंबी बातचीत के बाद हड़ताल टाल दी गई। अस्पतालों ने इलाज जारी रखने का फैसला लिया है। सरकार ने भुगतान प्रक्रिया तेज करने और नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हास्पिटल्स (एनएबीएच) प्रमाणपत्र की अनिवार्यता से फिलहाल छूट देने का आश्वासन दिया है। इसके बावजूद भुगतान और अस्पतालों की पात्रता को लेकर विवाद बरकरार है। जबलपुर के करीब 70 निजी अस्पतालों का 50 से 60 करोड़ रुपये बकाया होने का दावा है, जबकि एसोसिएशन के अनुसार, प्रदेश स्तर पर पोर्टल-1 में 1200 करोड़ और पोर्टल-2 में 1500 करोड़ रुपये अटके हैं।

739 अस्पतालों के सामने नई शर्त
आयुष्मान भारत निरामयम् योजना से जुड़े अस्पतालों के लिए 1 अक्टूबर से एनएबीएच प्रमाणपत्र की शर्त लागू हो चुकी है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में योजना से जुड़े 739 अस्पताल हैं। इनमें करीब 310 अस्पतालों के पास एनएबीएच प्रमाणपत्र बताया गया है। सरकारी अस्पतालों को अलग करने पर करीब 300 निजी अस्पतालों की आयुष्मान संबद्धता नई शर्त से प्रभावित होने की आशंका है। अस्पताल संगठनों की मांग है कि एनएबीएच को अनिवार्य करने के बजाय स्वैच्छिक और प्रोत्साहन आधारित व्यवस्था बनाई जाए। उनका कहना है कि गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा के मानकों से उन्हें आपत्ति नहीं है, लेकिन नियम अस्पताल के आकार, बिस्तरों की संख्या और उपलब्ध संसाधनों के हिसाब से व्यावहारिक होने चाहिए।

इलाज की मंजूरी के बाद भी क्लेम कटने पर सवाल
अस्पताल संचालकों का कहना है कि मरीज को भर्ती करने और उपचार शुरू करने से पहले बीमारी, उपचार और पैकेज के आधार पर प्री-ऑथराइजेशन लिया जाता है। इसके बाद अस्पताल अपने संसाधनों से मरीज का इलाज करता है। लेकिन उपचार पूरा होने के बाद तकनीकी या प्रक्रियागत कारणों से क्लेम रिजेक्ट या बड़ी राशि काट दिए जाने से अस्पतालों पर आर्थिक भार बढ़ रहा है। आईएमए मध्य प्रदेश अध्यक्ष डॉ. भजनलाल शरणागत के मुताबिक पुराने और वर्तमान पोर्टल पर भुगतान लंबित हैं। सीपीडी स्तर पर क्लेम अटके हैं और रिजेक्शन व कटौती की समस्या भी बनी हुई है। संगठनों का कहना है कि कई बार ज्ञापन और बैठकों के बावजूद स्थायी समाधान नहीं हुआ।

अस्पतालों की मांग-भुगतान की भी तय हो समय-सीमा
यूपीएचडीए मध्य प्रदेश अध्यक्ष डॉ. विशाल सिंह बघेल ने कहा कि अस्पतालों के लंबित भुगतान और क्लेम से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए समय-सीमा और जवाबदेही तय होनी चाहिए। अस्पतालों का कहना है कि यदि मरीज के इलाज की प्रक्रिया के लिए नियम और समय-सीमा तय है तो इलाज के बाद भुगतान के लिए भी स्पष्ट समय-सीमा होनी चाहिए। अस्पताल संगठनों ने प्रत्येक क्लेम रिजेक्शन या कटौती का लिखित कारण बताने, योग्य चिकित्सकों से क्लेम की जांच कराने और प्रभावी अपील व्यवस्था बनाने की मांग की है। साथ ही पैकेज दरों को वास्तविक उपचार खर्च के अनुरूप संशोधित करने की मांग भी रखी गई है। 

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